Sadak ki Atmakatha Nibandh: नमस्ते! मैं एक सड़क हूँ। हाँ, बिल्कुल सही सुना आपने। सड़क की आत्मकथा निबंध लिखते हुए मुझे अपनी पुरानी यादें ताज़ा हो रही हैं। मैं न छोटी हूँ, न बहुत लंबी। बस, एक सीधी सादी सड़क, जो एक छोटे से गाँव से होकर शहर की ओर जाती है। कल्पना कीजिए, जैसे कोई बच्चा अपनी डायरी में लिखता है, वैसे ही मैं अपनी कहानी सुना रही हूँ। मेरी उम्र अब बीस साल की हो चुकी है। लेकिन हर रोज़ नई कहानियाँ मेरे ऊपर चलती रहती हैं। आइए, मेरी जिंदगी की कुछ बातें सुनें।
मेरा जन्म एक धूप भरी सुबह हुआ था। मजदूर चाचा लोग आए थे। उनके हाथों में फावड़े थे, और आँखों में सपने। वे कहते थे, “यह सड़क बनेगी, तो बच्चे स्कूल आसानी से पहुँचेंगे।” मैं धीरे-धीरे बनी। कंकड़-पत्थरों से सजी, धूल भरी। लेकिन जैसे ही पहली बार कोई साइकिल मुझ पर चली, मुझे लगा जैसे कोई दोस्त आ गया हो। याद है, वह छोटा सा लड़का था। नाम था रामू। वह स्कूल जाता था, किताबें पीठ पर लटकाए। मैंने सोचा, “अरे वाह! मैं तो किसी की मदद कर रही हूँ।” आज भी जब सुबह-सुबह बच्चे मुझ पर दौड़ते हैं, मेरी सारी थकान उतर जाती है। सड़क की आत्मकथा में यह पहली याद सबसे प्यारी है – बच्चों के कदमों की ठक-ठक।
बचपन की तरह मेरी जिंदगी भी रंग-बिरंगी रही है। एक बार दादी माँ की कहानी सुनिए। दादी गाँव के बुजुर्गों में से एक थीं। वे रोज़ शाम को मुझ पर टहलने आतीं। हाथ में लाठी, और मुंह में पुरानी कहानियाँ। एक दिन उन्होंने बताया, “बेटी सड़क, तू जानती है? पुराने ज़माने में रास्ते कच्चे होते थे। बारिश में कीचड़ हो जाता। लेकिन तू तो पक्की है। तूने सबको जोड़ा है।” मैं चुपचाप सुनती। दादी की आवाज़ में गर्माहट थी। वे कहतीं, “मेरे पोते अब शहर पढ़ने जाते हैं। तू उनकी सहेली बनी।” उस दिन मुझे गर्व हुआ। मैंने सोचा, मैं तो सिर्फ पत्थरों की हूँ, लेकिन लोगों के दिल जोड़ती हूँ। दादी अब नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें मेरी सतह पर बसी हैं, जैसे कोई पुराना गीत। सड़क की आत्मकथा निबंध लिखते हुए यह बात याद आ गई कि जिंदगी छोटी-छोटी कहानियों से बनती है।
फिर आती हैं दोस्तों वाली यादें। स्कूल के बच्चे मेरी जान हैं। एक बार होली का दिन था। सारे बच्चे मुझ पर आए। रंग उड़ाते, गीत गाते। श्याम और रीता, मेरे दो प्यारे दोस्त। श्याम ने कहा, “सड़क दीदी, तू मत डर। हम तुझे साफ कर देंगे।” लेकिन रंगों से मैं लाल-पीली हो गई। हँसी-ठिठोली में दिन कट गया। शाम को जब वे चले, मैंने महसूस किया कि दोस्ती का रंग कभी मिटता नहीं। कभी-कभी झगड़े भी होते। जैसे, दो लड़के साइकिल पर आपस में धक्का-मुक्की करते। मैं चुप रहती, लेकिन मन में कहती, “बस करो यार। एक-दूसरे का हाथ थामो।” ऐसे छोटे-छोटे हादसे मुझे सिखाते हैं – धैर्य रखो, सब ठीक हो जाएगा। दोस्तों के साथ खेलना, दौड़ना, यह मेरी जिंदगी का सबसे मजेदार हिस्सा है। सड़क की आत्मकथा में ये पल जैसे चमकते सितारे हैं।
लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती। एक बार भारी बारिश आई। पानी ने मुझे बहा दिया। गड्ढे हो गए। लोग नाराज़ हो गए। “यह सड़क खराब हो गई!” वे चिल्लाए। मुझे दुख हुआ। लगा जैसे कोई बच्चा बीमार पड़ गया हो। लेकिन फिर क्या? गाँव वालों ने मिलकर मुझे ठीक किया। चाचा-ताऊ, भाई-बहन, सब आए। उन्होंने कहा, “सड़क बहन, तू हमारी है। हम तुझे नया बना देंगे।” उस दिन मैंने सीखा – मुश्किलें आती हैं, लेकिन हिम्मत से सब संभल जाता है। आज मैं फिर चमचमाती हूँ। कारें, बसें, साइकिलें – सब मुझ पर सरकती हैं। मैं देखती हूँ कैसे एक माँ अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाती है। कैसे कोई बूढ़ा चाचा बाजार से लौटता है। हर कदम में खुशी है। सड़क की आत्मकथा निबंध में यह सब लिखना जैसे अपना दिल खोलना है।
अब सोचिए, मेरी कहानी खत्म कहाँ होगी? मैं तो चलती रहूँगी। कल भी कोई नया बच्चा मुझ पर कूदेगा। कोई दादी मुझ पर टहलेगी। दोस्त हँसेंगे, और मुश्किलें आएंगी-जाएंगी। लेकिन मैं सिखाती रहूँगी – एक-दूसरे का साथ दो, मुस्कुराओ, और आगे बढ़ो। मैं एक सड़क हूँ, लेकिन दिल से तो इंसान हूँ। तुम भी अपनी जिंदगी को ऐसी ही बनाओ – सीधी, मजबूत, और सबको जोड़ने वाली। सड़क की आत्मकथा निबंध पढ़कर अगर तुम्हें थोड़ी सी मुस्कान मिली, तो मेरा काम बन गया। चलो, अब तुम भी बाहर जाओ और किसी सड़क से बात करो। शायद वह भी अपनी कहानी सुनाए!